Zindagi Ka Safar

ज़मीन से यूं फलक को तकता है
मंज़िल तेरी और तारों से रस्ता पूछता है?

Shayari- III

अजीब दास्तां थी वो मेरे ज़िंदगी की यारो
दास्तान-ए-मुहब्बत ही मुझे समझने दो||

Raahguzar

ऐसी राह पर निकल पड़ा हूं
जिसकी मंज़िल की मुझको ख़बर भी नहीं|

Ek Tara

चांद खूबसूरत है
परंतु नज़रों से उतरते ही अंधेरों से लिपट जाता है
इसलिए मैं तुम्हारे आसमां का चांद नहीं बनना चाहता