Shayari- III

चंद लम्हों का मोहताज था अपना अफसाना
उन लम्हों में ही इसे कैद रहने दो|
अजीब दास्तां थी वो मेरे ज़िंदगी की यारो
दास्तान-ए-मुहब्बत ही मुझे समझने दो||

दिन के अंधेरों में तुझको तलाशता हुं
रात के उजालों में नज़रे तुझे पहचान ना सकी|
खुद से खुद में यूं उलझा रहा मैं, के
अपने किनारों पे नज़रे तुझे देख ना सकी||

कितने वफादार हैं मेरे आंसू
एक आंख से गिरते हैं
और दूसरे को ख़बर तक नहीं|

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